एक बूढा

 

एक बूढा शाल ओढ़े
जिस्म बंजर, बाल थोड़े
सूखा चेहरा, बढती दाढ़ी
पांव में चप्पल, हाथ में लाठी ||

“ये लाठी नहीं सहारा है
बुझती आँख का तारा है”
सोच सोचकर गगन निहारे
बूढ़ा रोज ये बात विचारे ||

“हाथ फैलाऊँ बाहं पसारूं
टुकुर टुकुर सब राह निहारूँ
ग़ुरबत मेरे हाथ की रेखा
ऐसा क्यूँ है भाग्य का लेखा”

“धूल, मैल, फुटपाथ, प्रदुषण
क्यों ये सब मेरे आभूषण
गाली मेरे कान का गहना
क्यों ये दर्द पड़े हाय सहना”

“भूख बंधी क्यों पेट से मेरे
नंग धडंग क्यों अंग हैं मेरे”

सोच विचार रहे बूढ़े को
फिर जैसे कोई अपना मिलता
अपनी प्यासी आँख में तिरता
रोज उसे एक सपना मिलता ||

“ताज़ी रोटी, फल पकवान
खाने को कितना सामान
तन पर कपडा पगड़ी पहना
जेब में पैसा हाथ में गहना”

“एक घर भी हो मेरा अपना
कितना सुन्दर है ये सपना”

ठंडी एक हवा का झोंका
बूढ़ा आहट सुनकर चोंका
“अरे सपना तो सपना ही है
बेशक मेरा अपना ही है”

वो रोज ही सोचे रोज विचारे
बूढ़ा रोज ही गगन निहारे
फिर चलते रास्तों पर बैठा
बूढ़ा अपना हाथ पसारे ||

फिर चलते रास्तों पर बैठा
बूढ़ा अपना हाथ पसारे ||
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