हम दोनों

हम दोनो
एक उम्र से रहते हैं
साथ साथ
एक ही मकाँ में
दो दोस्तों की तरह ।

जब मैं कहता हूँ
वो सुनती है
एक ख़ामोश झील की तरह
शांत और स्थिर ।
और जवाब के इंतज़ार में
जब अधीर हो उठता हूँ मैं
तो सहमे से शब्द सुनाई देते हैं
सूखे कुएँ से आती प्रतिध्वनि की तरह ।
कभी मैं बरस पड़ता हूँ
फटते बादल की तरह
और वो मासूम पल्लवों की तरह
चुपचाप खड़ी रहती है ।
मैं इंतज़ार करता हूँ
प्रतिकार का, प्रतिबिंब का
मगर सब व्यर्थ
दर्पण ने प्रतिरूप को
निगल लिया हो जैसे ।
बेचैन हो उठता हूँ
और झकझोर देता हूँ उसे
मगर कोई हलचल नहीं
कोई प्रतिद्वंद नहीं
सिर्फ एक चुप्पी, एक ख़ामोशी ।
और कभी अचानक
बरस पड़ती
उसकी आँखे
एक सवाल लिए
अनसुलझा सा, अनचाहा सा ।
जवाब की तलाश लिए
मेरे चेहरे पर दौड़ जाती
उसकी निगाहें
और फिर बैरंग चिट्ठी की तरह
लौट जाती
छलकते आँसू ठहर जाते
वंही रस्ते पर
मानो अपने अस्तित्व का
मूल्य समझ गये हों
और फिर
एक हँसी फूट पड़ती
ख़ामोशी को चीरती
बेज़ुबान हँसी ।

मैं और मेरी तन्हाई
एक उम्र से रहते हैं
साथ साथ
एक ही मकाँ में
दो दोस्तों की तरह ।

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